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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 241
 
 
श्लोक  2.16.241 
से छल से - काले कृष्ण स्फुराबे तोमारे ।
कृष्ण - कृपा याँरे, तारे के राखिते पारे ॥241॥
 
 
अनुवाद
"उस समय तुम्हें किस प्रकार के साधन अपनाने होंगे, यह कृष्ण बताएँगे। यदि किसी पर कृष्ण की कृपा हो, तो उसे कोई नहीं रोक सकता।"
 
"Only Krishna will tell you what measures you will need to take at that time. If someone is blessed by Krishna, no one can stop him."
तात्पर्य
यद्यपि श्रील रघुनाथ दास श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलने के लिए बहुत व्याकुल थे, परंतु प्रभु ने उन्हें प्रतीक्षा करने और भगवान कृष्ण की कृपा का इंतजार करने की सलाह दी। उन्होंने रघुनाथ दास को यह भी सुझाव दिया कि वे बाहरी तौर पर सामान्य इंसान की तरह व्यवहार करते हुए अपने हृदय में कृष्ण-चेतना को अटल बनाए रखें। यह कृष्ण-चेतना से जुड़ चुके हर व्यक्ति की चाल है। कोई भी सामान्य इंसान की तरह समाज में रह सकता है परंतु साथ ही उसका मुख्य उद्देश्य कृष्ण को प्रसन्न करना और उनकी महिमा का प्रसार करना होना चाहिए। एक कृष्ण-भक्त को भौतिक चीज़ों में लिप्त नहीं होना चाहिए क्योंकि उसका एकमात्र उद्देश्य भगवान की भक्ति करना होता है। यदि कोई इस प्रकार लिप्त होता है, तो निश्चित रूप से भगवान कृष्ण उस पर कृपा करेंगे। जैसा कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने रघुनाथ दास को सलाह दी, "यथा-योग्य विषय भुंज अनुसाक्त हन्या।" इसी बात को दोहराया गया है "अंतरे निष्ठा कर, बाह्य लोक-व्यवहार।" इसका यह अर्थ है कि किसी के भी हृदय में कृष्ण की सेवा से इतर कोई इच्छा नहीं होनी चाहिए। इसी दृढ़ विश्वास को आधार बनाकर कोई कृष्ण-चेतना को विकसित कर सकता है। इस बात को भक्ति-रसामृत-सिंधु (1.2.200) में पुष्ट किया गया है:

लौकिकी वैदिकी वाँपि या क्रिया क्रियते मुने

हरि-सेवानुकुलेवा सा कार्य भक्तिम इछता

कोई भक्त एक सामान्य इंसान की तरह व्यवहार कर सकता है या वैदिक आज्ञाओं का सख्ती से पालन करने वाले के रूप में भी। इन दोनों ही स्थितियों में, वह जो भी कार्य करता है वह भक्ति-भाव को विकसित करने के लिए अनुकूल होता है क्योंकि वह कृष्ण-चेतना में होता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)