श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 240
 
 
श्लोक  2.16.240 
वृन्दावन देखि’ यबे आसिब नीलाचले ।
तबे तुमि आमा - पाश आसिह कोन छले ॥240॥
 
 
अनुवाद
"जब मैं वृंदावन से लौटूँगा, तब तुम मुझे नीलांचल, जगन्नाथपुरी में देख सकते हो। तब तक तुम भागने का कोई उपाय सोच सकते हो।"
 
"When I return from my visit to Vrindavan, you can meet me at Nilachal, Jagannath Puri. Until then, you can think of another way to escape."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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