श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 237
 
 
श्लोक  2.16.237 
स्थिर ह ञा घरे याओ, ना हओ बातुल ।
क्रमे क्रमे पाय लोक भव - सिन्धु - कूल ॥237॥
 
 
अनुवाद
"धैर्य रखो और घर लौट जाओ। पागल मत बनो। धीरे-धीरे तुम भवसागर पार कर जाओगे।"
 
"Be patient and go back home. Don't be crazy. You will gradually cross the ocean of existence."
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd