समश्रित ये पद-पल्लव-प्लवं
महत्-पदं पुण्य-यशो मुरारेः
भवम्बुधि वत्स-पदं परं पदं
पदं पदं यद् विपदां न तेषां
यह भौतिक विश्व एक विशाल समुद्र के समान है। इसकी शुरुआत ब्रह्मलोक से होती है और पाताललोक तक फैली हुई है, और इस महासागर में कई ग्रह या द्वीप हैं। भक्ति-भाव की जानकारी के अभाव में जीव इस महासागर में भटकता रहता है, जैसे कोई व्यक्ति तैरकर किनारे तक पहुँचने की कोशिश करता है। हमारे अस्तित्व का संघर्ष भी ऐसा ही है। हर कोई भौतिक अस्तित्व के महासागर से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है। तट तक तुरंत नहीं पहुंचा जा सकता है, लेकिन यदि कोई प्रयास करता है, तो वह श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से महासागर पार कर सकता है। कोई इस महासागर को पार करने के लिए बहुत उत्सुक हो सकता है, लेकिन वह पागल की तरह काम करके सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। उसे श्री चैतन्य महाप्रभु या उनके प्रतिनिधि के निर्देशों के तहत बहुत धैर्य और बुद्धिमानी से समुद्र को पार करना होगा। फिर, एक दिन, वह तट पर पहुंच जाएगा और घर, भगवद् निवास को लौट जाएगा।
