श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 236
 
 
श्लोक  2.16.236 
सर्वज्ञ गौराङ्ग - प्रभु जानि’ ताँर मन ।
शिक्षा - रूपे कहे ताँरे आश्वास - वचन ॥236॥
 
 
अनुवाद
चूँकि श्री चैतन्य महाप्रभु सर्वज्ञ थे, वे रघुनाथदास के मन की बात समझ सकते थे। इसलिए भगवान ने उन्हें निम्नलिखित आश्वासन भरे शब्दों से निर्देश दिया।
 
Since Sri Chaitanya Mahaprabhu was omniscient, he understood Raghunatha Das's thoughts. Therefore, Mahaprabhu consoled him and gave him this advice.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)