श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 235
 
 
श्लोक  2.16.235 
‘रक्षकेर हाते मुञि केमने छुटिब! ।
केमने प्रभुर सङ्गे नीलाचले याब?’ ॥235॥
 
 
अनुवाद
रघुनाथदास ने सोचा, "मैं पहरेदारों के हाथों से कैसे मुक्त हो पाऊँगा? मैं श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ नीलांचल कैसे जा पाऊँगा?"
 
Raghunatha Dasa thought, "How will I escape from the clutches of these guards? How will I go to Nilachal with Sri Chaitanya Mahaprabhu?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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