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श्लोक 2.16.228  |
बार बार पलाय तेंहो नीलाद्रि याइते ।
पिता ताँरे बान्धि’ राखे आ नि’ पथ हैते ॥228॥ |
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| अनुवाद |
| रघुनाथदास बार-बार घर से भागकर जगन्नाथपुरी जाते थे, लेकिन उनके पिता उन्हें बांधकर वापस लाते रहते थे। |
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| Raghunath Das kept running away from home to go to Jagannath Puri, but his father kept tying him up and bringing him back. |
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