श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 225
 
 
श्लोक  2.16.225 
ताँर पिता सदा करे आचा र्य - सेवन ।
अतएव आचार्य तारे हैला परसन्न ॥225॥
 
 
अनुवाद
रघुनाथदास के पिता गोवर्धन ने अद्वैत आचार्य की सदैव बहुत सेवा की। फलस्वरूप अद्वैत आचार्य परिवार से बहुत प्रसन्न थे।
 
Raghunatha Das's father, Govardhan, always served Advaita Acharya with great care. Consequently, Advaita Acharya was also very pleased with this family.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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