श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 201
 
 
श्लोक  2.16.201 
अलौकि क लीला करे श्री - कृष्ण - चैतन्य ।
येइ इहा शुने ताँर जन्म, देह धन्य ॥201॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की सभी लीलाएँ अद्वितीय हैं। जो कोई उनकी लीलाओं का श्रवण करता है, वह यशस्वी हो जाता है और उसका जीवन परिपूर्ण हो जाता है।
 
The pastimes of Sri Chaitanya Mahaprabhu are transcendental. Anyone who listens to these activities is blessed and their life is fulfilled.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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