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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 186
 
 
श्लोक  2.16.186 
यन्नामधेय - श्रवणानुकीर्तनाद् यत्प्रहणाद यत्स्मरणादपि क्वचि त् ।
श्वादोऽपि सद्यः सवनाय कल्पते कुतः पुनस्ते भगवन्नु दर्शनात् ॥186॥
 
 
अनुवाद
" 'परम पुरुष का साक्षात् दर्शन करने वाले व्यक्तियों की आध्यात्मिक उन्नति की तो बात ही छोड़िए, कुत्ते खाने वाले परिवार में जन्मा व्यक्ति भी यदि एक बार भगवान के पवित्र नाम का उच्चारण कर ले, उनका कीर्तन कर ले, उनकी लीलाओं का श्रवण कर ले, उन्हें नमस्कार कर ले, या उनका स्मरण कर ले, तो वह भी वैदिक यज्ञ करने के लिए तुरन्त योग्य हो जाता है।'"
 
"To say nothing of the spiritual progress of those who have a direct vision of the Lord. Even if a person born in a Chandala family once utters the Lord's holy name, chants His name, listens to His pastimes, salutes Him, or even remembers Him, he immediately becomes eligible to perform Vedic sacrifices."
तात्पर्य
यह श्रीमद-भागवतम (3.33.6) का उद्धरण है। इस श्लोक के अनुसार, कोई भी व्यक्ति किस पद पर है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वह नीच में से नीच—चंडाल या कुत्ते खाने वाला हो सकता है—परन्तु यदि वह प्रभु के पवित्र नाम का जाप और श्रवण करता है, तो वह तुरंत वैदिक यज्ञ करने का पात्र हो जाता है। विशेष रूप से यह कलियुग में सत्य है।

हरिरा नाम हरिरा नाम हरिरा नामैव केवलम्

कलो नास्त्येव नास्थ्येव नास्त्येव गतिरन्यथा

(बृहन्नारदीय पुराण 38.126)

“इस कलह और पाखंड के युग में, प्रभु के पवित्र नामों का जप ही उद्धार का एकमात्र साधन है। कोई और रास्ता नहीं है। कोई दूसरा रास्ता नहीं है। कोई और रास्ता नहीं है।” ब्राह्मण परिवार में जन्मा कोई व्यक्ति तब तक वैदिक यज्ञ नहीं कर सकता जब तक कि वह उचित रूप से शुद्ध न हो जाए और अपना पवित्र धागा न प्राप्त कर ले। हालाँकि, श्री चैतन्य-चरितामृत के वर्तमान छंद के अनुसार (जो श्रीमद-भागवतम से उद्धृत है), यह समझा जाता है कि यदि कोई नीच व्यक्ति भी ईमानदारी से प्रभु के पवित्र नाम का जप और श्रवण करता है, तो वह तुरंत यज्ञ कर सकता है। कभी-कभी ईर्ष्यालु लोग पूछते हैं कि इस कृष्ण चेतना आंदोलन में यूरोपीय और अमेरिकी कैसे ब्राह्मण बन सकते हैं और यज्ञ कर सकते हैं। वे नहीं जानते कि यूरोपीय और अमेरिकी पहले से ही प्रभु के पवित्र नाम—हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जप करके शुद्ध हो चुके हैं। यह प्रमाण है। स्वाडोऽपि सद्यः सवनय कल्पते। कोई कुत्ते खाने वालों के परिवार में पैदा हो सकता है, परन्तु वह केवल महामंत्र का जप करके यज्ञ कर सकता है।

जो पश्चिमी वैष्णवों में दोष ढूंढते हैं, उन्हें श्रीमद-भागवतम के इस कथन और श्रील जीव गोस्वामी की इस श्लोक पर की गई टिप्पणी पर विचार करना चाहिए। इस संबंध में, श्रील जीव गोस्वामी ने कहा है कि ब्राह्मण बनने के लिए व्यक्ति को शुद्धि की प्रतीक्षा करनी होती है और पवित्र धागा समारोह से गुजरना पड़ता है, लेकिन पवित्र नाम का जप करने वाले को पवित्र धागा समारोह की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। हम भक्तों को तब तक यज्ञ करने की अनुमति नहीं देते जब तक कि वे पवित्र धागा समारोह में उचित रूप से दीक्षित न हो जाएं। फिर भी इस श्लोक के अनुसार, पवित्र नाम का निरपराध जप करने वाला पहले से ही अग्नि अनुष्ठान करने के लिए उपयुक्त है, भले ही उसे पवित्र धागा समारोह द्वारा दोहरी दीक्षा न दी गई हो। यह निर्णय देवहूति ने दिया है, जो भगवान कपिलादेव की माँ हैं, जब वह उन्हें शुद्ध सांख्य दर्शन का निर्देश दे रही थीं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)