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श्लोक 2.16.149  |
‘प्रेमेर विवर्त’ इहा शुने येइ जन ।
अचिरे मिलिये ताँरे चैतन्य - चरण ॥149॥ |
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| अनुवाद |
| ये सब प्रेम-प्रसंगों की भ्रांतियाँ हैं। जो कोई इन घटनाओं को सुनता है, उसे शीघ्र ही श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की शरण प्राप्त होती है। |
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| These are all paradoxes of love. Anyone who hears these incidents quickly finds refuge at the lotus feet of Sri Chaitanya Mahaprabhu. |
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