श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 138
 
 
श्लोक  2.16.138 
ताँहार चरित्रे प्रभु अन्तरे सन्तोष ।
ताँहार हाते ध रि’ कहे क रि’ प्रणय - रोष ॥138॥
 
 
अनुवाद
गदाधर पंडित का व्यवहार श्री चैतन्य महाप्रभु के हृदय को अत्यंत प्रिय लगा। फिर भी, भगवान ने उनका हाथ पकड़कर प्रेमपूर्ण क्रोध प्रकट करते हुए उनसे बात की।
 
Gadadhara Pandita's behavior was very appealing to Sri Chaitanya Mahaprabhu. Nevertheless, Mahaprabhu took hold of his hand and, displaying loving anger, said:
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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