श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु द्वारा वृन्दावन जाने की चेष्टा  »  श्लोक 112
 
 
श्लोक  2.16.112 
आपनि प्रभुके लञा ताहाँ उत्तरिबा ।
रात्रि - दिबा वेत्र - हस्ते सेवाय रहिबा ॥112॥
 
 
अनुवाद
"तुम्हें स्वयं भगवान को इन नवनिर्मित घरों में ले जाना चाहिए। दिन-रात हाथ में छड़ी लेकर उनकी सेवा में लगे रहना चाहिए।"
 
"You must personally escort Mahaprabhu to these newly constructed homes. Carrying canes in your hands, you must serve him day and night."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)