श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  2.15.68 
राघव प ण्डिते कहेन वचन सरस ।
‘तोमार शुद्ध प्रेमे आमि हइ’ तोमार वश’ ॥68॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने राघव पंडित से कुछ मधुर वचन कहे। उन्होंने कहा, "मेरे प्रति आपके शुद्ध प्रेम के कारण मैं आपका ऋणी हूँ।"
 
After this, Sri Chaitanya Mahaprabhu spoke to Raghava Pandit in a sweet voice, “Your love for me is pure, for which I am grateful to you.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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