श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  2.15.65 
ताँर प्रेमे आनि’ आमाय कराय भोजने ।
अन्तरे मानये सुख, बाह्ये नाहि माने ॥65॥
 
 
अनुवाद
"उनके प्रेम से कृतज्ञ होकर मुझे वहाँ भोजन कराने लाया गया है। माँ भीतर से तो ये सब बातें जानती हैं और प्रसन्नता अनुभव करती हैं, परन्तु बाह्य रूप से वे इन्हें स्वीकार नहीं करतीं।"
 
Moved by their love, I go there to eat. My mother knows these things inwardly and is happy, but outwardly she does not accept them.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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