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श्लोक 2.15.52  |
नीलाचले आछों मुञि ताँहार आज्ञाते ।
मध्ये मध्ये आसिमु ताँर चरण देखिते ॥52॥ |
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| अनुवाद |
| "मैं उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए यहाँ जगन्नाथ पुरी, नीलांचल में रह रहा हूँ। लेकिन समय-समय पर मैं उनके चरण-कमलों के दर्शन भी करता हूँ।" |
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| "I am staying here in Jagannatha Puri (Nilachal) to obey his orders. But I will come every now and then to see his lotus feet. |
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