श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  2.15.47 
एइ वस्त्र माताके दि ह’, एइ सब प्रसाद ।
दण्डवत्क रि’ आमार क्षमाइह अपराध ॥47॥
 
 
अनुवाद
"भगवान जगन्नाथ का यह प्रसाद और यह वस्त्र लेकर मेरी माता शचीदेवी को दे दो। उन्हें प्रणाम करके उनसे मेरे अपराधों को क्षमा करने की प्रार्थना करो।"
 
"Take this Jagannath Prasad and this cloth. Go and give them to my mother, Shachidevi. After paying your respects to her, pray to her to forgive my sin."
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd