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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 300
 
 
श्लोक  2.15.300 
षाठीर मातार प्रेम, आर प्रभुर प्रसाद ।
भक्त - सम्बन्धे याहा क्षमिल अपराध ॥300॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार मैंने सार्वभौम की पत्नी, जो षष्ठी की माता कहलाती हैं, के आनंदमय प्रेम का वर्णन किया है। मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु की उस महान कृपा का भी वर्णन किया है, जो उन्होंने अमोघ के अपराध को क्षमा करके प्रकट की थी। उन्होंने ऐसा अमोघ के एक भक्त के साथ संबंध के कारण किया था।
 
Thus I have described the love of the mother of Sathi, the wife of Sarvabhauma. I have also described the great mercy of Sri Chaitanya Mahaprabhu, which He displayed by forgiving Amogha's transgression. He did this because of Amogha's relationship with the devotee.
तात्पर्य
अमोघ एक अपराधी था क्योंकि उसने भगवान की निंदा की थी। नतीजतन, वह हैजा से मरने वाला था। बीमारी के हमले के कारण अमोघ को अपने सभी अपराधों से मुक्त होने का अवसर नहीं मिला लेकिन सर्वभौम भट्टाचार्य और उनकी पत्नी भगवान के बहुत प्रिय थे। उनके संबंध की वजह से, श्री चैतन्य महाप्रभु ने अमोघ को क्षमा कर दिया। भगवान के द्वारा दंडित होने की बजाय, वह भगवान की दया से बच गया। यह सब सर्वभौम भट्टाचार्य के श्री चैतन्य महाप्रभु के लिए अटूट प्रेम की वजह से था। बाह्य रूप से, अमोघ सर्वभौम भट्टाचार्य का दामाद था और उसका पालन-पोषण सर्वभौम ही कर रहे थे। फलस्वरूप, यदि अमोघ को क्षमा नहीं किया जाता, तो उसका दंड सीधे सर्वभौम को प्रभावित करता। अमोघ की मृत्यु अप्रत्यक्ष रूप से सर्वभौम भट्टाचार्य की मृत्यु का कारण बनती।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)