श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.15.30 
देखि’ महाप्रभु बड़ सन्तोष पाइला ।
माता - पिता - ज्ञाने दुँहे नमस्कार कैला ॥30॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु यह देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने उन्हें अपना पिता-माता मानकर प्रणाम किया।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu was very pleased to see this. He accepted them as his father and mother and bowed to them.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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