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श्लोक 2.15.3  |
जय श्री - चैतन्य - चरितामृत - स्रोता - गण ।
चैतन्य - चरितामृत - याँर प्राण - धन ॥3॥ |
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| अनुवाद |
| श्री चैतन्य-चरितामृत के उन श्रोताओं की जय हो जिन्होंने इसे अपना जीवन और आत्मा मान लिया है! |
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| Victory to the listeners of Sri Chaitanya Charitamrita, who have considered it their life and soul. |
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