vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री चैतन्य चरितामृत
»
लीला 2: मध्य लीला
»
अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना
»
श्लोक 284
श्लोक
2.15.284
सार्वभौम - गृहे दास - दासी, ये कुक्कुर ।
सेह मोर प्रिय, अन्य जन रहु दूर ॥284॥
अनुवाद
"सार्वभौम भट्टाचार्य के घर के सभी लोग, यहाँ तक कि उनके दास-दासियाँ और उनका कुत्ता भी, मुझे बहुत प्रिय हैं। और उनके सम्बन्धियों का तो कहना ही क्या?
"Everyone in Sarvabhauma Bhattacharya's household is very dear to me—even his servants and his dog. So what can I say about his relatives?"
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd