येषां त्वंता-गतं पापं जननाम पुण्य-कर्मणाम
ते द्वंद्व-मोहा-निर्मुक्ता भजन्ते माम द्रिढ-व्रताः
"जिन लोगों ने पिछले जन्मों और इस जन्म में पुण्य कर्म किए हैं और जिनके पाप कर्म पूरी तरह से समाप्त हो गए हैं, वे भ्रम के द्वंद्व से मुक्त हो जाते हैं, और वे दृढ़ संकल्प के साथ मेरी सेवा में स्वयं को संलग्न करते हैं।"
एक ब्राह्मण एक बहुत ही विद्वान विद्वान हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह भौतिक संदूषण से मुक्त है। हालाँकि, एक ब्राह्मण का संदूषण अच्छाई के तरीके में है। भौतिक दुनिया में, तीन तरीके अच्छाई, जुनून और अज्ञान हैं, और ये सभी केवल संदूषण के विभिन्न श्रेणी हैं। जब तक कोई ब्राह्मण इस तरह के संदूषण को पार नहीं कर जाता है और निष्ठावान भक्ति सेवा के मंच पर नहीं पहुंचता है, उसे वैष्णव के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। एक अमान्यवादी परम सत्य की अवैयक्तिक ब्रह्म विशेषता के बारे में पता हो सकता है, लेकिन उसकी गतिविधियाँ अवैयक्तिक मंच पर होती हैं। कभी-कभी वह भगवान के एक रूप (सगुण-उपासना) की कल्पना करता है, लेकिन ऐसा प्रयास पूर्ण प्राप्ति प्राप्त करने में कभी भी सफल नहीं होता है। अमान्यवादी खुद को एक ब्राह्मण मान सकता है और अच्छाई के तरीके में स्थित हो सकता है, लेकिन फिर भी वह भौतिक प्रकृति के किसी एक तरीके से वातानुकूलित होता है। इसका मतलब यह है कि वह अभी तक मुक्त नहीं हुआ है, क्योंकि जब तक कोई भी तरीके से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो जाता, तब तक मुक्ति प्राप्त नहीं की जा सकती है। किसी भी मामले में, मायावादी दर्शन किसी को भी वातानुकूलित रखता है। यदि कोई उचित दीक्षा के माध्यम से वैष्णव बन जाता है, तो वह स्वचालित रूप से ब्राह्मण बन जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं है। गरुड़ पुराण इसकी पुष्टि करता है:
ब्राह्मणणां सहस्रेभ्यः सत्र-याजी विशिष्यते
सत्र-याजी-सहस्रेभ्यः सर्व-वेदांत-पारगः
सर्व-वेदांत-वित-कोट्या विष्णु-भक्तो विशिष्यते
"कई हजारों ब्राह्मणों में से, एक यज्ञ करने के योग्य हो सकता है। ऐसे कई हजारों योग्य ब्राह्मणों में से, एक वेदांत दर्शन से पूरी तरह अवगत हो सकता है। कई लाखों विद्वान वेदांत विद्वानों में से, एक विष्णु-भक्त या भगवान विष्णु का भक्त हो सकता है। वही सबसे ऊंचा है।"
जब तक कोई पूरी तरह से योग्य ब्राह्मण नहीं बन जाता, तब तक वह आध्यात्मिक विज्ञान में आगे नहीं बढ़ सकता है। एक वास्तविक ब्राह्मण कभी भी वैष्णवों से ईर्ष्या नहीं करता है। यदि वह है, तो उसे एक अपूर्ण नौसिखिया माना जाता है। अमान्यवादी ब्राह्मण हमेशा वैष्णव सिद्धांतों के विरोधी होते हैं। वे वैष्णवों से ईर्ष्या करते हैं क्योंकि वे जीवन के लक्ष्य को नहीं जानते हैं। ना ते विदुः स्वार्थ-गतिम हि विष्णुम। हालाँकि, जब कोई ब्राह्मण वैष्णव बन जाता है, तो कोई द्वंद्व नहीं होता है। यदि कोई ब्राह्मण वैष्णव नहीं बनता है, तो वह निश्चित रूप से ब्राह्मण मंच से गिर जाता है। इसकी पुष्टि श्रीमद्-भागवतम (11.5.3) द्वारा की गई है: ना भजन्त्य अवजानंति स्थानाद् भ्रष्टाः पतंत्य अधः।
हम वास्तव में देख सकते हैं कि कलियुग में कई तथाकथित ब्राह्मण वैष्णवों से ईर्ष्या करते हैं। कलियुग से दूषित ब्राह्मण देवता पूजा को काल्पनिक मानते हैं: अर्च्ये विष्णौ शिला-धीर् गुरुषु नर-मतिर् वैष्णवे जाति-बुद्धिः। ऐसा दूषित ब्राह्मण सतही तौर पर भगवान के एक रूप की कल्पना कर सकता है, लेकिन वास्तव में वह मंदिर में देवता को पत्थर या लकड़ी का बना हुआ मानता है। इसी तरह, ऐसा दूषित ब्राह्मण गुरु को एक साधारण मानव मानता है, और जब कृष्ण भावना आंदोलन द्वारा एक वैष्णव बनाया जाता है तो वह विरोध करता है। कई तथाकथित ब्राह्मण हमसे लड़ने का प्रयास करते हैं, कहते हुए, "तुम एक यूरोपीय या अमेरिकी से ब्राह्मण कैसे बना सकते हो? एक ब्राह्मण का जन्म केवल एक ब्राह्मण परिवार में ही हो सकता है।" वे यह नहीं मानते कि किसी भी प्रकट शास्त्र में यह कभी नहीं कहा गया है। भगवान कृष्ण ने भगवद-गीता (4.13), चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुण-कर्म-विभागशः में स्पष्ट रूप से कहा है: "भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों और उनके साथ जुड़े कार्य के अनुसार, मानव समाज के चार विभाग मेरे द्वारा बनाए गए हैं।"
इस प्रकार ब्राह्मण जाति व्यवस्था का परिणाम नहीं है। वह केवल योग्यता से ही ब्राह्मण बनता है। इसी तरह, एक वैष्णव किसी विशेष जाति का नहीं होता है; बल्कि उसका पदनाम भक्ति सेवा के प्रस्तुतिकरण से निर्धारित होता है।
