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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 264
 
 
श्लोक  2.15.264 
षाठीरे कह - तारे छाड़क, से हइल ‘पतित’ ।
‘पतित’ हइले भर्ता त्यजिते उचित ॥264॥
 
 
अनुवाद
"मेरी बेटी साठी को बता दो कि वह अपने पति से नाता तोड़ ले, क्योंकि वह पतित हो गया है। जब पति पतित हो जाए, तो पत्नी का कर्तव्य है कि वह नाता तोड़ दे।"
 
"Tell my daughter Shathi to break off relations with her husband, for he has fallen. When a husband falls, it is the wife's duty to break off relations with him."
तात्पर्य
श्रीला सर्वभौम भट्टाचार्य विचार करते हैं कि यदि अमोघ की हत्या हो जाती है तो हत्यारे को ब्राह्मण के शरीर को मारने के लिए पापकर्म का भागी बनना होगा। इसी कारण, भट्टाचार्य को आत्महत्या नहीं करनी चाहिए क्योंकि वह भी एक ब्राह्मण हैं। चूँकि कोई भी रास्ता स्वीकार नहीं किया जा सकता है, भट्टाचार्य ने अमोघ से अपना रिश्ता खत्म करने का और फिर कभी उसका चेहरा नहीं देखने का निर्णय लिया।

जहाँ तक ब्राह्मण के शरीर को मारने की मान्यता है, श्रीमद्भागवतम् (1.7.53) ब्रह्मबंधु के संबंध में निम्न निर्देश देता है जो ब्राह्मण पिता का जन्म लेता है लेकिन ब्राह्मण संबंधी गुणों से रहित होता है:

श्री-भगवान उवाच

ब्रह्मबंधुर्न हंतव्य आतातायी वधार्हणः

"भगवान श्री कृष्ण ने कहा, 'एक ब्रह्मबंधु को नहीं मारना चाहिए, लेकिन यदि वह आक्रामक है, उसे मार देना चाहिए।'"

स्मृति का उद्धरण करते हुए, श्रीला श्रीधर स्वामी श्रीमद्भागवतम् के इस उद्धरण पर टिप्पणी करता है:

आतातायिनमायांतम अपि वेदांतपारगम्

जिघां संतं जिघांसीयान् ना तेन ब्रह्महा भवेत्

"एक आक्रामक जो मारने का इरादा रखता है, वेदांत का बहुत विद्वान हो सकता है, फिर भी उसे मार दिया जाए क्योंकि वह दूसरों की हत्या करने में حسद करता है। ऐसे में किसी ब्राह्मण को मारना पाप नहीं है।"

श्रीमद्भागवतम (1.7.57) में यह भी कहा गया है:

वपनं द्रविणादानं स्थानान्निर्यापणं तथा

एष हि ब्रह्मबंधूनां वधो नान्योऽस्ति दैहिकः

"उसके बाल काटना, उसे उसके धन से वंचित करना और उसे उसके निवास से निकालना ब्रह्मबंधु के लिए निर्धारित दंड है। शरीर की हत्या करने का कोई निर्देश नहीं है।"

जहाँ तक सर्वभौम भट्टाचार्य की बेटी षष्ठी की बात है, उसे अपने पति से रिश्ता तोड़ने की सलाह दी गई। इस संबंध में, श्रीमद्भागवतम् (5.5.18) में कहा गया है, न पतिश्च स स्यान न मोचयेद्यः समुपेतमृत्युम्: "कोई भी पति नहीं हो सकता यदि वह अपने आश्रितों को अनिवार्य मृत्यु से मुक्त नहीं कर सकता है।" यदि व्यक्ति कृष्ण भावना में नहीं है और आध्यात्मिक शक्ति से वंचित है, तो वह अपनी पत्नी को जन्म और मृत्यु के चक्र से नहीं बचा सकता। नतीजतन ऐसे व्यक्ति को पति के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। एक पत्नी को अपना जीवन और सब कुछ कृष्ण को समर्पित करना चाहिए ताकि कृष्ण भावना में और उन्नति हो सके। यदि उसका पति कृष्ण भावना को त्याग देता है और वह उससे अपना संबंध तोड़ देती है, तो वह द्विज-पत्नियों के कदमों पर चलती है, जो ब्राह्मणों की पत्नियाँ थीं जो यज्ञों का प्रदर्शन करती थीं। ऐसे रिश्ते को खत्म करने के लिए पत्नी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। इस संबंध में, श्री कृष्ण श्रीमद्भागवतम (10.23.31-32) में द्विज-पत्नियों को आश्वासन देते हैं:

पतयो नाभ्यसूयेरन् पितृभ्रातृसुतादयः

लोकाश्च वो मयोपेता देवा अप्यनुमन्वते

न प्रीतयेऽनुरागाय ह्यंगा-संगो नृणामिह

तन मनो मयि युंजाना अचिरान् मामवाप्स्यथा

"मेरी प्रिय द्विज-पत्नियों, निश्चिंत रहें कि आपके पति आपकी वापसी पर आपकी उपेक्षा नहीं करेंगे और न ही आपके भाई, बेटे या पिता आपको स्वीकार करने से इंकार करेंगे। क्योंकि आप मेरे शुद्ध भक्त हैं, न केवल आपके रिश्तेदार बल्कि सामान्य रूप से लोग और देवता भी आपसे संतुष्ट होंगे। मेरे लिए दिव्य प्रेम शारीरिक संबंध पर निर्भर नहीं करता है, लेकिन जिसका मन हमेशा मुझमें लीन रहता है, वह निश्चित रूप से बहुत जल्द मेरे अनन्त संगठन के लिए मेरे पास आएगा।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)