श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  2.15.22 
अद्वैत कहे , - सत्य कहि, ना करिह कोप ।
लगुड़ फिराइते पार, तबे जानि गोप ॥22॥
 
 
अनुवाद
इस समय श्रील अद्वैत आचार्य बोले, "कृपया क्रोधित न हों। मैं सत्य कह रहा हूँ। मैं तभी जानूँगा कि आप एक ग्वालबाल हैं, जब आप इस छड़ी को घुमा सकेंगे।"
 
Then Srila Advaita Acharya said, "Don't be angry. I'm telling the truth. If you can turn this stick into a crescent shape, I'll know you're a cowherd."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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