श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 202
 
 
श्लोक  2.15.202 
भट्टाचार गृहे सब द्रव्य आछे भरि’ ।
येबा शाक - फलादिक, आनाइल आ हरि’ ॥202॥
 
 
अनुवाद
सार्वभौम भट्टाचार्य के घर में हमेशा अन्न का भंडार भरा रहता था। पालक, सब्ज़ियाँ, फल आदि जो भी ज़रूरत होती, वे इकट्ठा करके घर ले आते थे।
 
Sarvabhauma Bhattacharya's house always had a stock of food. Whatever spinach, vegetables, fruits, etc. were needed, they brought and stored.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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