तबे सार्वभौम करे आर निवेदन ।
तोमार सङ्गे सन्यासी आछे दश - जन ॥193॥
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अनुवाद
इसके बाद सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, “हे प्रभु, आपके साथ दस संन्यासी हैं।”
After this Sarvabhauma Bhattacharya said, “O Lord, there are ten sannyasis with you.”
तात्पर्य
एक संन्यासी को स्वयं भोजन नहीं बनाना चाहिए या किसी भक्त के घर पर लगातार कई दिनों तक खाने के निमंत्रण को स्वीकार नहीं करना चाहिए। श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों के प्रति बहुत दयालु और स्नेही थे, फिर भी उन्होंने सर्वभौम के घर पर एक लंबा निमंत्रण स्वीकार नहीं किया। स्नेह से उन्होंने महीने में केवल पांच दिन ही स्वीकार किए। प्रभु के साथ रहने वाले दस संन्यासी थे (1) परमानंद पुरी, (2) स्वरूप दामोदर, (3) ब्रह्मानंद पुरी, (4) ब्रह्मानंद भारती, (5) विष्णु पुरी, (6) केशव पुरी, (7) कृष्णानंद पुरी, (8) नृसिंह तीर्थ, (9) सुखानंद पुरी और (10) सत्यानंद भारती।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥