Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 193
 
 
श्लोक  2.15.193 
तबे सार्वभौम करे आर निवेदन ।
तोमार सङ्गे सन्यासी आछे दश - जन ॥193॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, “हे प्रभु, आपके साथ दस संन्यासी हैं।”
 
After this Sarvabhauma Bhattacharya said, “O Lord, there are ten sannyasis with you.”
तात्पर्य
एक संन्यासी को स्वयं भोजन नहीं बनाना चाहिए या किसी भक्त के घर पर लगातार कई दिनों तक खाने के निमंत्रण को स्वीकार नहीं करना चाहिए। श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों के प्रति बहुत दयालु और स्नेही थे, फिर भी उन्होंने सर्वभौम के घर पर एक लंबा निमंत्रण स्वीकार नहीं किया। स्नेह से उन्होंने महीने में केवल पांच दिन ही स्वीकार किए। प्रभु के साथ रहने वाले दस संन्यासी थे (1) परमानंद पुरी, (2) स्वरूप दामोदर, (3) ब्रह्मानंद पुरी, (4) ब्रह्मानंद भारती, (5) विष्णु पुरी, (6) केशव पुरी, (7) कृष्णानंद पुरी, (8) नृसिंह तीर्थ, (9) सुखानंद पुरी और (10) सत्यानंद भारती।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)