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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 172
 
 
श्लोक  2.15.172 
एक उडुम्बर वृक्षे लागे कोटि - फले ।
कोटि ये ब्रह्माण्ड भासे विरजार जले ॥172॥
 
 
अनुवाद
“जिस प्रकार उडुम्बर वृक्ष पर करोड़ों फल लगते हैं, उसी प्रकार विरजा नदी के जल पर करोड़ों ब्रह्माण्ड तैरते हैं।
 
“Just as the Udumbara tree bears millions of fruits, similarly millions of universes float in the waters of the river Viraja.
तात्पर्य
विराजा एक नदी है जो भौतिक जगत को आध्यात्मिक जगत से अलग करती है। विराजा नदी के एक तरफ ब्रह्मलोक का तेज और असंख्य वैकुण्ठ ग्रह हैं, और दूसरी तरफ यह भौतिक जगत है। यह समझा जाना चाहिए कि विराजा नदी के इस पार, कारण सागर में तैरते भौतिक ग्रह भरे हुए हैं। विराजा नाम आध्यात्मिक और भौतिक जगत के बीच की एक सीमांत स्थिति को इंगित करता है, लेकिन विराजा नदी भौतिक ऊर्जा के नियंत्रण में नहीं है। परिणामस्वरूप यह तीनों गुणों से रहित है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)