Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 154
 
 
श्लोक  2.15.154 
एइ - मत सेवकेर प्रीति चाहि प्रभु - पाय ।
प्रभु छाड़ाइलेह, पद छाड़ान ना याय ॥154॥
 
 
अनुवाद
" 'भक्त को भगवान के चरणकमलों में ठीक इसी प्रकार प्रेम और अनुराग रखना चाहिए। भगवान यदि वियोग भी चाहते हों, तो भी भक्त उनके चरणकमलों का आश्रय नहीं छोड़ सकता।
 
"A devotee should have such love for the Lord's feet. Even if the Lord wishes to release him, the devotee cannot leave the shelter of His feet."
तात्पर्य
प्रभू या मालिक शब्द यह दर्शाता है कि भगवान की अपने भक्त द्वारा लगातार सेवा की जानी है। असली प्रभु भगवान श्री कृष्ण हैं। भले ही, कई भक्त भगवान रामचंद्र से जुड़े हैं, और मुरारी गुप्ता ऐसे ही विशुद्ध भक्ति का एक ज्वलंत उदाहरण हैं। उन्होंने भगवान रामचंद्र की पूजा छोड़ने को कभी सहमति नहीं दी, श्री चैतन्य महाप्रभु के अनुरोध पर भी नहीं। श्री चैतन्य चरितामृत (अंतिम लीला-4.46-47 ) के अनुसार भक्ति सेवा की पवित्रता इस प्रकार है:

ऐसे भक्त भाग्यशाली हैं, जो प्रभु के चरणों को नहीं छोड़ते हैं

ऐसे प्रभु भाग्यशाली हैं, जो अपने भक्तों को नहीं छोड़ते हैं

यदि दुर्भाग्य से सेवक कहीं और चला जाता है

वैसे ठाकुर भाग्यशाली हैं जो उसे बालों से पकड़ कर वापस ले आते हैं

भगवान के साथ दृढ़ सम्बन्ध में, भक्त किसी भी परिस्थिति में भगवान की सेवा नहीं छोड़ता है। जहाँ तक भगवान की बात है, तो यदि भक्त जाना चाहता है, तो भगवान उसे वापस ले आते हैं, उसे बालों से खींच कर।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)