श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 150
 
 
श्लोक  2.15.150 
श्री - रघुनाथ - चरण छाड़ान ना याय ।
तव आज्ञा - भङ्ग हय, कि करों उपाय ॥150॥
 
 
अनुवाद
"मेरे लिए रघुनाथजी के चरणकमलों की सेवा का त्याग करना संभव नहीं है। साथ ही, यदि मैं ऐसा नहीं करूँगा तो आपकी आज्ञा का उल्लंघन करूँगा। मैं क्या कर सकता हूँ?"
 
"I cannot stop serving the lotus feet of Raghunath. Besides, if I don't do so, I would be violating your orders. What should I do?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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