श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 149
 
 
श्लोक  2.15.149 
रघुनाथेर पाय मुञि वेचियाछों माथा ।
काढ़िते ना पारि माथा, मने पाइ व्यथा ॥149॥
 
 
अनुवाद
मुरारी गुप्त ने कहा, 'मैंने अपना सिर रघुनाथ के चरण कमलों में बेच दिया है। मैं अपना सिर वापस नहीं ले सकता, क्योंकि इससे मुझे बहुत दुःख होगा।'
 
Murari Gupta said, "I have sold my head at the feet of Raghunath. I cannot take it back now, as it would cause me immense pain."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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