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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 132
 
 
श्लोक  2.15.132 
नरहरि रहु आमार भक्त - गण - सने, ।
एइ तिन कार्य सदा करह तिन जने’ ॥132॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने तब नरहरि को आदेश दिया: "मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे भक्तों के साथ यहीं रहो। इस प्रकार तुम तीनों को भगवान की सेवा के लिए इन तीन कर्तव्यों का सदैव पालन करना चाहिए।"
 
Then Sri Chaitanya Mahaprabhu ordered Narahari, "I want you to stay here with my devotees. In this way, you three should always perform these three tasks in the service of the Lord."
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु ने तीन अलग-अलग व्यक्तियों के लिए तीन कर्तव्य निर्धारित किए। मुकुंद को धन कमाना था और धार्मिक सिद्धांतों का पालन करना था, जबकि नरहरि को भगवान के भक्तों के साथ रहना था, और रघुनंदन को मंदिर में भगवान की सेवा में संलग्न होना था। इस प्रकार, एक व्यक्ति मंदिर में पूजा करता है, दूसरा अपने व्यावसायिक कर्तव्य को निष्पादित करके ईमानदारी से धन कमाता है, और तीसरा भक्तों के साथ कृष्ण चेतना का प्रचार करता है। जाहिर है, ये तीन प्रकार की सेवा अलग-अलग दिखाई देती हैं, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। जब कृष्ण या श्री चैतन्य महाप्रभु केंद्र होते हैं, तो हर कोई भगवान की सेवा के लिए विभिन्न गतिविधियों में संलग्न हो सकता है। यह श्री चैतन्य महाप्रभु का निर्णय है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)