श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु द्वारा सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करना  »  श्लोक 103
 
 
श्लोक  2.15.103 
गृहस्थ विषयी आमि, कि मोर साधने ।
श्री - मुखे आज्ञा कर प्रभु - निवेदि चरणे ॥103॥
 
 
अनुवाद
सत्यराज खाँ ने कहा, "हे प्रभु, एक गृहस्थ और भौतिकवादी व्यक्ति होने के नाते, मैं आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ने की प्रक्रिया नहीं जानता। इसलिए मैं आपके चरणकमलों में समर्पण करता हूँ और आपसे आदेश देने की प्रार्थना करता हूँ।"
 
Satyaraj Khan said, "O Lord, as a householder and a materialistic person, I do not know how to advance in spiritual life. Therefore, I take refuge at your feet and pray that you guide me."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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