श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  2.14.60 
देखिया प्रतापरुद्र पात्र - मित्र - सङ्गे ।
प्रभुर महिमा देखि’ प्रेमे फुले अङ्गे ॥60॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु की महानता को देखकर प्रतापरुद्र महाराज तथा उनके मंत्री और मित्र प्रेम से इतने अभिभूत हो गए कि उनके शरीर के रोंगटे खड़े हो गए।
 
Seeing the greatness of Sri Chaitanya Mahaprabhu, Prataparudra Maharaja and his ministers and friends were so overwhelmed with emotional love that they were thrilled.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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