| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 2: मध्य लीला » अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन » श्लोक 57 |
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| | | | श्लोक 2.14.57  | आनन्दे करये लोक ‘जय’ ‘जय’ - ध्वनि ।
‘जय जगन्नाथ’ बइ आर नाहि शुनि ॥57॥ | | | | | | | अनुवाद | | जब गाड़ी आगे बढ़ी, तो सभी लोग बड़े आनंद से जयकारे लगाने लगे, “सारी जय हो! सब जय हो!” और “भगवान जगन्नाथ की जय हो!” कोई और कुछ नहीं सुन सका। | | | | As the chariot began to move forward, everyone cheered and began to shout, "Jai!" "Jai!" and "Victory to Lord Jagannath!" Nothing else could be heard. | | ✨ ai-generated | | |
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