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श्लोक 2.14.3  |
जय जय श्रीवासादि गौर - भक्त - गण ।
जय श्रोता - गण, - याँर गौर प्राण - धन ॥3॥ |
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| अनुवाद |
| श्रीवास ठाकुर सहित सभी भक्तों की जय हो! उन पाठकों की जय हो जिन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु को अपना जीवन और आत्मा मान लिया है! |
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| Victory to all devotees like Srivasa Thakura and others! Victory to all readers who have considered Sri Chaitanya Mahaprabhu as their life treasure. |
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