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श्लोक 2.14.252  |
भाग्यवान्सत्यराज वसु रामानन्द ।
सेवा - आज्ञा पा ञा हैल परम - आनन्द ॥252॥ |
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| अनुवाद |
| भगवान से सेवा का आदेश पाकर सौभाग्यशाली सत्यराज और रामानन्द वसु अत्यन्त प्रसन्न हुए। |
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| Lucky Satyaraj and Ramanand Vasu were extremely happy after getting the order to serve from Mahaprabhu. |
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