| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 2: मध्य लीला » अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन » श्लोक 237 |
|
| | | | श्लोक 2.14.237  | नित्या नन्द विना प्रभुके धरे कोन्जन ।
प्रभुर आवेश ना झाय, ना रहे कीर्तन ॥237॥ | | | | | | | अनुवाद | | केवल नित्यानंद प्रभु ही श्री चैतन्य महाप्रभु को पकड़ सकते थे, लेकिन प्रभु का आनंद-विभोर भाव रुकता ही नहीं था। साथ ही, कीर्तन भी जारी नहीं रह पाता था। | | | | Only Nityananda Prabhu was able to hold Mahaprabhu, but Mahaprabhu's rage was unstoppable. Even kirtan could not be continued at that time. | | ✨ ai-generated | | |
|
|