श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन  »  श्लोक 217
 
 
श्लोक  2.14.217 
इँहो दामोदर - स्वरूप - शुद्ध - व्रजवासी ।
ऐश्वर्य ना जाने इँहो शुद्ध - प्रेमे भा सि’ ॥217॥
 
 
अनुवाद
"स्वरूप दामोदर वृंदावन के शुद्ध भक्त हैं। उन्हें तो यह भी नहीं पता कि ऐश्वर्य क्या होता है, क्योंकि वे तो बस शुद्ध भक्ति में लीन रहते हैं।"
 
Svarupa Damodara is a pure devotee of Vrindavan. He does not even know what opulence is, because he is immersed in pure devotion.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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