श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन  »  श्लोक 202
 
 
श्लोक  2.14.202 
अनन्त कृष्णेर लीला ना याय वर्णन ।
आपने वर्णेन यदि ‘सहस्त्र - वदन’ ॥202॥
 
 
अनुवाद
“श्रीकृष्ण की असीमित लीलाओं का वर्णन करना बिल्कुल भी संभव नहीं है, भले ही वे स्वयं सहस्रवदन, हजार मुख वाले शेष नाग के अवतार में उनका वर्णन करते हैं।”
 
“It is simply impossible to describe the infinite pastimes of Sri Krishna, even if He Himself describes Himself as the incarnation of Sahasra Vadana, the thousand-headed serpent Shesha.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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