श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन  »  श्लोक 185
 
 
श्लोक  2.14.185 
राधा वसि’ आछे, किबा वृन्दावने याय ।
ताहाँ यदि आचम्बिते कृष्ण - दरशन पाय ॥185॥
 
 
अनुवाद
“कभी-कभी जब श्रीमती राधारानी बैठी होती हैं या जब वह वृंदावन जा रही होती हैं, तो वह कृष्ण को देखती हैं।
 
“Sometimes when Srimati Radharani is sitting or when She is going to Vrindavan, She gets the vision of Krishna.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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