श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन  »  श्लोक 181
 
 
श्लोक  2.14.181 
बाष्प - व्याकुलतारुणाञ्चल - चलन्नेत्रं रसोल्लासितं हेलोल्लास - चलाधरं कुटिलित - भू - युग्ममुद्यस्मितम् ।
राधायाः किल - किञ्चिताञ्चितमसौ वीक्ष्याननं सङ्गमाद् आनन्दं तमवाप कोटि - गुणितं योऽभून्न गीर्गोचरः ॥181॥
 
 
अनुवाद
“आँसुओं से व्याकुल, श्रीमती राधारानी की आँखें सूर्योदय के समय पूर्वी क्षितिज की भाँति लालिमा से आच्छादित थीं। उनके होंठ उल्लास और काम-वासना से हिलने लगे। उनकी भौंहें झुक गईं और उनका कमल-सदृश मुख मंद-मंद मुस्कुरा उठा। राधारानी के मुख पर ऐसी भाव-भंगिमा देखकर, भगवान श्रीकृष्ण को उनसे आलिंगन करने से भी लाखों गुना अधिक प्रसन्नता हुई। वास्तव में, भगवान श्रीकृष्ण का सुख सांसारिक नहीं है।”
 
"Shrimati Radharani's eyes, overwhelmed with tears, turned red, like the eastern horizon at sunrise. Her lips trembled with joy and lust. Her eyebrows furrowed, and a faint smile appeared on her lotus-like face. Seeing such expressions on Radharani's face brought Krishna a joy a million times greater than embracing her. This joy of Lord Krishna is not material at all."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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