श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन  »  श्लोक 173
 
 
श्लोक  2.14.173 
एइ - सब स्थाने ‘किल - किञ्चि त’ उद्गम ।
प्रथमे ‘हर्ष’ सञ्चारी - मूल कारण ॥173॥
 
 
अनुवाद
"ऐसे समय में, किला-किंचिता के उन्मादपूर्ण लक्षण जागृत होते हैं। पहले उन्मादपूर्ण प्रेम में उल्लास होता है, जो इन लक्षणों का मूल कारण है।"
 
"On such occasions, the symptoms of a playful emotion are awakened. First, there is a surge of joy in the emotional love, and this is the root cause of these symptoms.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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