श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन  »  श्लोक 153
 
 
श्लोक  2.14.153 
प्राखर्य, मार्दव, साम्य स्वभाव निर्दोष ।
सेइ सेइ स्वभावे कृष्णे कराय सन्तोष ॥153॥
 
 
अनुवाद
"यद्यपि कुछ गोपियाँ बातूनी, कुछ सौम्य और कुछ समभावी हैं, फिर भी वे सभी दिव्य और दोषरहित हैं। वे अपनी अनूठी विशेषताओं से कृष्ण को प्रसन्न करती हैं।"
 
"Although some of the gopis are talkative, some are gentle, and some are composed, they are all divine and innocent. They please Krishna with their unique qualities."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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