| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 2: मध्य लीला » अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन » श्लोक 140 |
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| | | | श्लोक 2.14.140  | प्रभु कहे, - कह व्रजेर मानेर प्रकार ।
स्वरूप कहे , - गोपी - मान - नदी शत - धार ॥140॥ | | | | | | | अनुवाद | | श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "कृपया मुझे वृंदावन में प्रकट अहंकार के प्रकारों के बारे में बताइए।" स्वरूप दामोदर ने उत्तर दिया, "गोपियों का अभिमान सैकड़ों सहायक नदियों से बहने वाली नदी के समान है।" स्वरूप दामोदर ने उत्तर दिया, "गोपियों का अभिमान सैकड़ों सहायक नदियों से बहने वाली नदी के समान है। | | | | Sri Chaitanya Mahaprabhu said, “Please describe all the types of pride that appear in Vrindavan.” Svarupa Damodara replied, “The pride of the gopis is like a river flowing with hundreds of streams. | | ✨ ai-generated | | |
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