श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन  »  श्लोक 126
 
 
श्लोक  2.14.126 
अतएव कृष्णेर प्राकट्ये नाहि किछु दोष ।
तबे केने लक्ष्मीदेवी करे एत रोष ? ॥126॥
 
 
अनुवाद
“चूँकि कृष्ण की लीलाओं में कोई दोष नहीं है, तो फिर भाग्य की देवी क्रोधित क्यों हो जाती हैं?”
 
“Since there is no fault in Krishna's pastimes, then why does Lakshmiji get angry?”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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