श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 14: वृन्दावन लीलाओं का सम्पादन  »  श्लोक 101
 
 
श्लोक  2.14.101 
प्रभु - सड़े स्वरूपादि कीर्तनीया गाय ।
दिक्वि दिक्नाहि ज्ञान प्रेमेर वन्याय ॥101॥
 
 
अनुवाद
तब स्वरूप दामोदर जैसे भक्त और अन्य कीर्तनकर्ता श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ गायन करने लगे। प्रेमोन्मत्त होकर, उन्हें समय और परिस्थिति का कोई ध्यान ही नहीं रहा।
 
Then Swarupa Damodara and other kirtaniyas also began singing along with Sri Chaitanya Mahaprabhu. Overwhelmed with love, they lost sight of the time and circumstances.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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