श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 13: रथयात्रा के समय महाप्रभु का भावमय नृत्य  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  2.13.80 
नाहं विप्रो न च नर - पतिर्नापि वैश्यो न शुद्रो नाहं वर्णी न च गृह - पतिर्नो वनस्थो यतिर्वा ।
किन्तु प्रोद्यन्निखिल - परमानन्द - पूर्नामृताब्धेर् गोपी - भर्तुः पद - कमलयोर्दास - दासानुदासः ॥80॥
 
 
अनुवाद
“मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, क्षत्रिय नहीं हूँ, वैश्य या शूद्र नहीं हूँ। न ही मैं ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ या संन्यासी हूँ। मैं तो केवल भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों के सेवक के सेवक, गोपियों के पालनहार के रूप में ही स्वयं को पहचानता हूँ। वे अमृत के सागर के समान हैं और वे ही विश्वव्यापी दिव्य आनंद के कारण हैं। वे सदैव तेजस्विता से विद्यमान रहते हैं।”
 
"I am neither a Brahmin, nor a Kshatriya, nor a Vaishya, nor a Shudra. I am not a celibate, nor a householder, nor a Vanaprastha, nor a Sanyasi. I am the slave of the slave of the slave of the lotus feet of Lord Krishna, the Lord of the Gopis. He is like an ocean of nectar and the cause of the universe's divine bliss. He is always radiant."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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