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श्लोक 2.13.58  |
सार्वभौम - सङ्गे राजा करे ठाराठारि ।
आर केह नाहि जाने चैतन्येर चुरि ॥58॥ |
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| अनुवाद |
| राजा और सार्वभौम भट्टाचार्य दोनों ही भगवान के कार्यों से परिचित थे, किन्तु अन्य कोई भी भगवान चैतन्य महाप्रभु की चालाकियों को नहीं देख सकता था। |
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| Both the king and Sarvabhauma Bhattacharya were aware of Mahaprabhu's leela, but no one else could see the tricks of Sri Chaitanya Mahaprabhu. |
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