श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 13: रथयात्रा के समय महाप्रभु का भावमय नृत्य  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  2.13.54 
केह लखिते नारे प्रभुर अचिन्त्य - शक्ति ।
अन्तरङ्ग - भक्त जाने, याँर शुद्ध - भक्ति ॥54॥
 
 
अनुवाद
वस्तुतः भगवान की अचिन्त्य शक्ति को कोई भी नहीं देख सकता था। केवल परम गोपनीय भक्त, शुद्ध एवं अनन्य भक्ति में लीन भक्त ही उसे समझ सकते थे।
 
In reality, no one could see the inconceivable power of Mahaprabhu. Only the most intimate devotees, those in pure, exclusive devotion, could understand it.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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