श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 13: रथयात्रा के समय महाप्रभु का भावमय नृत्य  »  श्लोक 170
 
 
श्लोक  2.13.170 
प्रभुर हृदये आनन्द - सिन्धु उथलिल ।
उन्माद, झञ्झा - वात तत्क्षणे उठिल ॥170॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के हृदय में दिव्य आनन्द का सागर फैल गया और पागलपन के लक्षण तुरन्त तूफान की तरह तीव्र हो गए।
 
An ocean of divine bliss was surging in the heart of Sri Chaitanya Mahaprabhu and the symptoms of madness in him immediately started gaining strength like a storm.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd