श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 13: रथयात्रा के समय महाप्रभु का भावमय नृत्य  »  श्लोक 142
 
 
श्लोक  2.13.142 
देह - स्मृति नाहि यार, संसार - कूप काहाँ तार
ताहा हैते ना चाहे उद्धार ।
विरह - समुद्र - जले, काम - तिमिङ्गिले गिले
गोपी - गणे ने ह’ तार पार ॥142॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, "गोपियाँ विरह के महासागर में गिर गई हैं और आपकी सेवा करने की अपनी महत्वाकांक्षा रूपी तिमिंगिल मछली द्वारा निगली जा रही हैं। गोपियों को इन तिमिंगिल मछलियों के मुख से मुक्ति मिलनी ही है, क्योंकि वे शुद्ध भक्त हैं। चूँकि उनमें जीवन की कोई भौतिक अवधारणा नहीं है, तो वे मोक्ष की आकांक्षा क्यों करें? गोपियाँ योगियों और ज्ञानियों द्वारा वांछित मोक्ष नहीं चाहतीं, क्योंकि वे पहले ही भवसागर से मुक्त हो चुकी हैं।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu continued, "The gopis have fallen into the ocean of separation and are being swallowed by the mermaid of desire to serve You. As pure devotees, the gopis must be saved from these mermaids. They have no material experience of life, so why should they aspire for liberation? The gopis do not want the liberation desired by yogis and jnani (enlightened beings), because they have already been liberated from the ocean of material existence.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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